दाम्पत्य जीवन मे बढ़ता असमायोजन

वर्तमान समय मे विवाह नामक संस्था के बदलते स्वरूप पर एक खेल |

द्वारा डॉ आभा सक्सेना, मानोवैज्ञानिक परामर्शदाता एवं असिस्टेंट प्रोफेसर ( मनोविज्ञान)

‘ विवाह’- क्या आज भी जनम जनम का साथ है ?

कहा जाता है की शादियाँ आसमानों मे बनती  है पर निभाई जमीन पर ही जाती है या यूं कहें की जो शादियाँ खूबसूरत  अंजाम तक पहुँचती है उन्ही के लिए शायद यह कहावत प्रचलित हुई होगी कि  जोड़ियाँ तो ऊपर वाला आसमानों से बना कर भेजता है |

भारतीय संस्कृति मे विवाह को एक पवित्र बंधन माना गया है एक ऐसा बंधन जिसमे केवल एक लड़का और एक लड़की ही दाम्पत्य सूत्र में नहीं बंधते है बल्कि दो परिवारों मे भी निकटता घनिष्ठता का संबंध स्थापित होता है | विवाह की एक घटना से बहुत कुछ जुड़ जाता है | परिवार के बुजुर्ग लोगों की मान- मर्यादा, बहन, भाइयों, सखियों, मित्रों, और हम उम्र लोगों  की   संवेदनाएं और भावी संतानों की परवरिश और संस्कार की व्यवस्था |

लगभग तीन चार दशक पहले तक विवाह नामक संस्था के प्रति बहुत बड़े वर्ग की जो सोच थी वह यह थी की विवाह की बनाए रखने का हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए | प्रयास जब भी दोनों व्यक्तियों या दोनों परिवारों की ओर से किए जाते थे तो विवाहित जोड़े का सफर हसीन हो जाता था नहीं तो सामाजिक दबाव और पारिवारिक हस्तक्षेप रूपी सर्विस सेंटर से बार-बार गुजरती हुई विवाह रूपी गाड़ी किसी न किसी तरह अपने अंतिम पड़ाव तक पहुँच ही जाती थी| अंतिम दौर तक पहुँचने के इस प्रयास मे विवाह सूत्र मे बंधे दोनों प्राणी और कभी-कभी दोनों के परिवार जन भी अपने सपनों का गला घोंट देते थे तो कभी अपने अस्तित्व को मिटा कर दूसरों की अपेक्षाओ के ढांचे मे ढल जाते थे|

सुखी प्रतीत होने वाले इन रिश्तों की कड़वी सच्चाई का अंदाजा तब लगता था जब कभी तलकी के दौरान किसी का सब्र और आत्मा नियंत्रण का बांध टूट जाता था और उनके मुह से निकाल पड़ता था ‘तुम्हारे घर मे ऐसा होता होगा इस घर मे ऐसा नहीं होता ‘ या जब से इस घर मे आई हूँ तब से, आदि |

विवाह का यह स्वरूप जीना सही था या गलत इस पर एक मत नहीं हो सकता | रूढ़ियों परम्पराओ और आदर्श सामाजिक व्यवस्था को मानने वाले यही कहेंगे की सामाजिक ढांचे को मजबूत बनाए रखने के लिए समझौते करने पड़ते है | यदपि विवाहित जोड़ा व्यक्तिगत रूप से एक अच्छा जीवन नहीं जी पाता है पर पारिवारिक ढांचे, अर्थव्यवस्था, बच्चे के पालन पोषण और उनके संवेगात्मक, विकास पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ने पाता |

इसके विपरीत विवाह के बारे मे दूसरी राय रखने वाला एक और वर्ग है और इस वर्ग के लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है| यह वह वर्ग है जो मानता है की विवाह अत्यंत व्यक्तिगत घटना है और दो लोगों के बीच मे घटने वाली| इसीलिए कम्पैटबिलटी टू ईच अदर’ ही विवाह का एक मात्र आधार होना चाहिए| इस विचारधार को मानने वाले कहते है कि यदि हम एक दूसरे के साथ संतुष्ट अनुभव नहीं करते तो हमारे साथ रहने का कोई औचित्य नहीं है | हमे अलग हो जाना चाहिए| वे यह भी मानते है हर व्यक्ति को अपनी खुशी से जीने का अधिकार है | अपने लिए अधिकारों की बात करते – करते यह वर्ग कुछ बोनस अधिकार भी अपने लिए सुरक्षित कर लेता है जैसे एक्स्ट्रमैरिटल अफेर की सुविधा लेने का | उनकी इस तरह की सोच से उपजी व्यवस्था विसंगतियों को जन्म देती है, मानसिक रोगों और अपराधों की भूमि तैयार करती है|

अति तो हर चीज की बुरी होती है यह बात कबीर दास जी युगों पहले कह गए थे सामाजिक भए और दबाओ के कारण एक पति या पत्नी एक दूसरे के द्वारा दी गई शारीरिक मानसिक आर्थिक प्रताड़ना लगातार सहता या सहती रहे, पथ भ्रमित साथी की चेतना सदैव सुषुप्त ही बनी रहे समाज और परिवार के सभ्रांत लोग पति पत्नी के बीच मे हस्तक्षेप न करने के अधिकार की दुहाई देकर मुकदर्शक बने रहे, यह भी गलत है| परिवार समाज और दाम्पत्य जीवन की रक्षा के नाम पर यह विचारधारा स्वागत योग्य नहीं है| जिसके रहते विवाह और परिवार नाम की संस्था का लाइफ स्पान छोटा होता जा रहा है जबकि सत्य यह है कि किसी की स्वतंत्रता का विस्तार क्षेत्र वही तक होता है जहां से किसी दूसरे की स्वतंत्रता आरंभ हो रही होती है | स्वतंत्र और पर्सनल स्पेस के नाम पर आज विवाह संस्था की स्थिति लिमिटेड ओवर के कमर्शियल क्रिकेट जैसी हो गई है | बड़े –बड़े खेल आयोजन, तेज रफ्तार से पैसा कमाना, मकान खरीदना, शॉपिंग करना, विदेश यात्राएं करना आदि और फिर जब सुख सुविधा रूपी विकेट गिरने लगे, तो मन मे यह इच्छा करना की अगले साल किसी न किसी दूसरी टीम के लिए खेलने को मिल जाएगा | जीवन को खेल की उपमा दी जाती है, पर जीवन खेल नहीं है| खेल जीवन का एक भाग हो सकता है पर जीवन का अंत खेल की तरह नहीं होना चाहिए |

समय की विडंबना है की वर्तमान समय मे विवाह किसी एक सुहाने सफर की शुरुवात नहीं है मात्र एक शानदार आयोजन है| विस्मित कर देने वाला आयोजन, जिसमे दोनों पक्ष के परिवार अपनी वर्षों से अर्जित धन, प्रतिष्ठा, मान सब दाव पर लगा देते है| विवाह कैसे निभाया जाता है वर वधू बने लड़के और लड़की को इसकी शिक्षा दी ही नहीं जाती | आयोजन की चकाचौंध इतनी है लड़का लड़की स्वयं भी यह शिक्षा लेने के लिए उत्सुक दिखाई नहीं देते| बस क्या पहन है, समारोह कैसा होना है, कितने लोग आएंगे, हम कैसे लगेंगे, हम कहा घूमने जाएंगे इन महत्वहीन विषयों पर ही तमाम युवा वर्ग अटका रहता है यह वैसा ही है जैसे बिना गहरी और मजबूत नींव डाले किसी मकान मे सुंदर कारीगरी कर दी जाए |कारीगरी की उम्र नींव की मजबूती पर निर्भर करती है और वैवाहिक जीवन की मजबूत नीव डालने के लिए ये जरूरी है युवाओं को सद्भावना का अर्थ समझना, आवश्यकता पड़ने पर एक दूसरे की बेहतरी के लिए स्वयक्षिक रूप से त्याग की भवन रखना|

सारांश यह है कि विवाह की सफलता ना आदर्शवादी होकर एक दूसरे के अत्याचार या कमियाँ झेलने मे है और न ही उन्मादी होकर विवाह को तोड़ने मे तथा एक दूसरे के प्रति आक्रामक एवं तिरस्कार युक्त व्यवहार करने मे | थोड़ी सी परवाह एक दूसरे को, थोड़ी सी परानुभूति, थोड़ा स सहयोग, अपेक्षाओ तथा तुलना से थोड़ी दूरी बना कर रखना, बस यही कुछ बातें है जो विवाह  ही नहीं किसी भी संबंध को जीवंत और सुखद बना देते है|


Comments

nochelatino on April 9, 2021 2:33 am
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